Wednesday, September 17, 2014

ऐसा क्यूं है कि चराग सारे चुप हैं


ऐसा क्यूं है कि चराग सारे चुप हैं
वतन परस्तों की कतारे चुप हैं

अँधेरे से जंग कब तक झोपड़े करेंगे
अभी भी महलों की दीवारे चुप हैं

सड़क पर क़त्ल हुआ एक गरीब का
अमीरों की जश्न में डूबे अखबारे चुप हैं

कोई वज़ह तो होगी कि हिमालय भी बहने लगा
पूछो तो, हर राज्य की सरकारे चुप है

कैसा खौफनाक मंज़र था उस वारदात का
आज तक चाँद और तारे चुप हैं

बर्बादी बेहिसाब हुई पूरा शहर डूबा
अपनी ग़लती पे दरिया और किनारे चुप हैं

जुर्म करने वालों तुम बेकौफ फिरो
आज कल बगावत के नारे चुप हैं

पत्थरों की चोरी में चिराग भी गुम हुए
अपनी बदकिस्मती पे मज़ारे चुप हैं

Saturday, September 13, 2014

जज़्बातों के दरिया को घुमाव नया मिले

चलते फिरते रास्तों पे पड़ाव नया मिले
जज़्बातों के दरिया को घुमाव नया मिले

दिन धूप  जलना  चाँदनी  रात  पिघलना
अँधेरे उजाले के जंग को लहकाव नया मिले

जो फिसलना मुक्क़दर हो राहे इश्क़ में, तो
ज़माने की नज़र के लिए चढ़ाव नया मिले

हमने जाना है मजा-ए-फ़ाक़ा-मस्ति मगर
ज़ायका  परस्ती में कोई  घाव  नया मिले

गुफ़्तगू  हुई  तनहाई  से  सारी  रात
तन्हा सफर में इसे पड़ाव नया मिले

मुंतज़िर हैं साहिल पे हमारी हसरते तमाम
हक़ीक़त से लड़ते सपनों को बहाव नया मिले

मिट जो जायें राहे इंतज़ार में यूँ ही बेमाने
ज़माने को चर्चा और मनबहलाव नया मिले

मुख़्तसर है दुनिया मुख़्तसर ज़िन्दगानी
दिलखोल मिले सबसे कुछ ठहराव नया मिले

Monday, August 25, 2014

मौत से पहले दर्द का हिसाब क्यूँ

मौत से पहले दर्द का हिसाब क्यूँ
तेरे होने पे भी मिज़ाज ख़राब क्यूँ

घर यादों में बना लूँ तेरे बिना फिर भी 
दरीचों से झाकने को दिल बेताब क्यूँ

वस्ल का महताब आज भी है शर्माता
जुदाई पे बेबाक हुआ आफ़ताब क्यूँ

अँधेरों के राज़ अँधेरे में हैं दम तोड़ते
इस उजाले पे फ़िजूल हिजाब क्यूँ

हक़ीक़त के शिकंजे में रोती है रूह
ख़ाबों के परों में आया शबाब क्यूँ

गर्दिशों ने चखाया हमें अब्रों शराब
वाइज़ पूछे तो भी दूँ जवाब क्यूँ

Tuesday, August 5, 2014

चाँद, तारों की गुफ्तगू सुनता रहा रात भर

चाँद, तारों की गुफ्तगू सुनता रहा रात भर
'The Starry Night' painting by Vincent van Gogh
जलन से बादल रंग बदलता रहा रात भर

नज़र में आने को बेताब एक परिंदा 
हवा में कलाबाजियाँ करता रहा रात भर

जलती शमा के इश्क़ में पागल परवाना
काँच पर  सर  पटकता  रहा  रात  भर

किसी और को न पा कर हवा फिर से
सोते पेड़ को  जगाती  रही  रात  भर

मखमल के बिस्तर से सड़क के फूटपाथ तक
नए पुराने ख़ाबों का सौदा होता रहा रात  भर

नादान औलादों की गुस्ताखी माफ़ कर, वो 
फ़िज़ा को शबनम से सजाता रहा रात भर

सबकी जरूरत जान कर थका हारा सूरज
फिर से जलने को तैयार होता रहा रात भर