Saturday, May 3, 2014

असम - क्या हाथों में हथियार जरूरी है

ये कैसी मजबूरी है
अपनी मर्ज़ी से जी भी न सकते
अपनी मर्जी से मर भी न सकते

कहते है उनके सोच में आंधी है
तूफानों से लोहा लेते
जंगलों में अपना बाग बनाते
उनके पत्थर पानी एक है
मगर
ये दर तो उनका है
हम तो घास चरने वाले हैं
तो फिर क्यूँ
अपनी मर्ज़ी से मैदान चुन भी न सकते
अपनी मर्ज़ी से कहीं टहल भी न सकते
ये कैसी मजबूरी है

आकाश का रंग वो बताते हैं लाल
चेहरे पर रंग लगाते हैं लाल
बन्दुक की पिचकारी करती है सब लाल
उनकी सोच है लाल
मगर
हमें तो आकाश दीखता है नीला
घास का मैदान दूर तक है हरा
तो फिर क्यूँ
अपनी मर्ज़ी से रंग चुन भी न सकते
अपनी मर्ज़ी से होली खेल भी न सकते
ये कैसी मजबूरी है

वो बताते है धरती का यह हिस्सा अपना है
नदी का पानी हो रहा जूठा है
पहाड़ की छाव छीनी जा रही है
जंगल के रस लुटे जा रहे हैं
मगर
हमने तो छाझा रह्ना सिखा है
मिल बाँट कर खाना-पीना सिखा है
तो फिर क्यूँ
अपनी मर्ज़ी से कहीं रह भी न सकते
अपनी मर्ज़ी से कुछ चुन भी न सकते
ये कैसी मजबूरी है

वो चेहरे को अच्छा और बूरा बताते हैं
ये अपनों का और ये हानिकारक कौम का
ये हमें घाव को हरा रखना सिखाते हैँ
बदले में जलना और जलाना सिखाते हैं
मगर
हमें तो अपनों के साथ सुख-दुःख बाँटने आता है
जरूरत पे एक दूसरे के काम अाना आता है
तो फिर क्यूँ
अपनी मर्ज़ी से अपना पराया मान भी न सकते
अपनी मर्ज़ी से बेहिचक कुछ कह भी न सकते
ये कैसी मजबूरी है

ये कैसी मजबूरी है
क्या अमन पसन्द कमजोरी है
ये कैसी मजबूरी है
क्या हाथों में हथियार जरूरी है

Wednesday, April 30, 2014

तेरी खुशबू के लिये

झगड़ रहीं थीं दिशायें
जिनके बीच
सहमी खड़ी थी हवा
अपने आगोश में
लिए तेरी खुशबू

रो रहें थें सजे रास्ते
चुप थें बातूनी पत्ते

खुशी से लहरा रहे थें
तो केवल कुछ घास के तिनके
जिनपे खड़ी थी हवा
लिए तेरी खुशबू


Friday, April 18, 2014

गाँव वैसे नहीं बदला

पिछले हफ्ते अरसो बाद अपना गाँव देखा।  सोचा था पूरा बदल गया होगा मगर पाया वही बचपन का गाँव कुछ नए जेवर पहने। उन यादों के एक हिस्से को ग़ज़ल में समेटने की कोशिश -

यहां लोगों का मिट्टी से रिश्ता बाकी है
पक्की सड़क से वो कच्चा रास्ता बाकी है !!

हर मुसीबत में लोग भागे चले आते हैं
आदमी का इंसानियत से राब्ता बाकी है  !!

एक पैर खड़ा बगुला वैसे हीं तकता है
कीचड़ में भी मछली ज़िंदा बाकी है !!

गाँव के बूढ़े भी नहीं जानते जिसकी उम्र 
उस बूढ़े पीपल पे अब भी पत्ता बाकी है !!

डाकिये को आज भी याद है सबका नाम 
पुराने मकान पे टंगा लाल डब्बा बाकी है !!

गाँव से बाहर बरगद के नीचे कुएं पे
सबके लिए एक बाल्टी रक्खा बाकी है !!

सूरज से पहले हीं लोगों को जगाता
मंदिर में लटका पुराना घन्टा बाकी है !!

सुबह सुबह खुली हवा में गाती कोयल 
शाम को लौटते तोते का जत्था बाकी है !!

पतली क्यारियों के होकर जाते हैं लोग वहाँ
खेतों के बीच देवी स्थान पे लहराता झंडा बाकी है !!

सुबह शाम उठता है धुँआ कुछ आँगन से
पक्के छत पे सूखता कच्चा घड़ा बाकी है !!

पुराने खम्भों पे नयी तारें बिछ गयी हैं
बिजली है फिर भी हाथ वाला पंखा बाकी है !!

फसलों की खशबू साथ ले चलती है हवा
उसमें अब भी वही निश्छलता बाकी है !!

पक्की सड़क से वो कच्चा रास्ता बाकी है !!

Tuesday, April 15, 2014

सूखता दरिया प्यासा जीना सिखा गया

वो बेवफा न था मगर बेवफा बना गया
सूखता दरिया प्यासा जीना सिखा गया !

काटों में रहा हरदम फिर भी हँसता रहा
टुटा गुल गिरकर भी महकना सिखा गया !

ज़मीं न घोसला, आसमां था जिसका ठिकाना
उड़ता परिंदा फ़कीरी का मज़ा बता गया !

छोटा था मगर अड़ा था, तूफ़ानो से भी लड़ा था
चौखट का चिराग लड़कर जलना सिखा गया !

गिरता रहा बढ़ता रहा, औरों के लिए मुड़ता रहा
वो एक दरिया था जो हर हाल में बढ़ना सिखा गया !