Saturday, October 11, 2014

हमने खुद अपनी सज़ा मक़बूल की है

हमने खुद अपनी सज़ा मक़बूल की है
अँधेरे में रहकर चुप रहना कबूल की है

आपस की आग सुलह कर बुझा लेते
बाहरी हवाओं को बुलाने की भूल की है

एक ज़ख्म तुम्हारा एक दर्द हमारा
कैसी ज़ोर सौदेबाजी की वसूल की है ?

सरहद की लक़ीर दरिया-ए-लहू हुआ
कैसे मोहब्बत की बाते फिजूल की है

हुआ करते थें कभी बाग़ बगीचे जहाँ
आपसी रंजिश में ज़र्रे ज़र्रे को शूल की है

नज़र खुली भी 'शादाब' तो ऐसे कि
हर मंज़र को पहले से ही धूल की है

1 comment:

kuldeep thakur said...

सुंदर प्रस्तुति...
दिनांक 13/10/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
सादर...
कुलदीप ठाकुर