Sunday, June 3, 2018

अपने हीं लोगों में कहीं खो गए हम


अपने हीं लोगों में कहीं खो गए हम
ज़िंदा होते हुए भी क्यूँ सो गए हम।।

घायल, रोता हुआ गिड़गिड़ाता रहा
बचते हुए सड़क पार हो गए हम।।

भगवान की दुहाई सुनाई न पड़ी
मगर फ़िल्मी गानों पे रो गए हम।।

ज़िन्दगी भर भागते रहे जिससे
आखिर में उसी मिट्टी के हो गए हम।।

कुछ सवालों में उलझे रहे ताउम्र
ख़ुद एक सवाल बन खो गए हम।।

गठरी लिए फिरते हैं अपने खाबों की
क्या सोचा था और क्या हो गए हम।।


~पंकज कुमार "शादाब"

Sunday, September 10, 2017

उसने अंधेरों में हीं जो घर बनाना चाहा


उसने अंधेरों में हीं जो घर बनाना चाहा
उजालों ने उसपे भी हक़ जमाना चाहा

कदम रखने को जहाँ मिलती नहीं जगह
सुना है किसी ने खुद को दफनाना चाहा

ख्वाहिश थी लह-लहा के जलूँ , मगर  
बारिशों ने तो कभी हवाओं ने बुझाना चाहा
 
वह जागना चाहा मगर आँख लगती रही
हसीं खाबों ने उसे पूरजोर सताना चाहा

जिन रास्तों पे चलते हौसला पस्त हुआ
उन्ही रास्तो ने हुस्ने मंज़िल दिखाना चाहा

रंजे नाकामी जो जिगर से निकल न सका
हक़ जताते पूरे जिस्म को तड़पाना चाहा

~ पंकज कुमार 'शदाब'

Friday, February 10, 2017

हर बार लौट कर तेरी पहलू में आना होता है

हर बार लौट कर तेरी पहलू में आना होता है
बंजारे की भी ख्वाहिश कोई ठिकाना होता है।।

ख़ुशी का रास्ता गम बेहिचक बताते हैं
उन्हें पता है, फिर लौट कर सबको आना होता है

सबकी ज़िन्दगी हादसों की फेहरिस्त है
इससे किसी को थोड़े ही रुक जाना होता है

किसी को क़ामयाबी ऐसे ही नहीं मिलती
कितने ही बार खुद को आज़माना होता है।।

ग़ज़ल यूँ ही ज़हन में कब उतरती है "शादाब"
दिल ओ दिमाग को रूह में समाना होता है।।
~पंकज कुमार "शादाब"

Sunday, February 5, 2017

अपने गाँव में मैं एक परिंदा होता हूँ

अपने गाँव में मैं एक परिंदा होता हूँ
इस भागते शहर में बस ज़िंदा होता हूँ।।

मिलते ही अपने जनों से मुस्कुरा देता हूँ
यादों की बस्ती का बाशिन्दा होता हूँ।।

लौटते कदम रोते हैं सड़क के साथ
समझ नहीं आता कैसा बेदर्द बन्दा होता हूँ।।

भीतर से बिलकुल खाली, काम में मसरूफ
सर को संभालता मज़बूर कन्धा होता हूँ।।

बेजान फिरता हूँ इन ईमारतों के जंगल में
बचपन की गलियों से गुजरते ज़िंदा होता हूँ।।

कुछ तो मज़बूरी है जीने में "शादाब"
अपनी ही ख़ुशी के गले का फन्दा होता हूँ।।

~पंकज कुमार "शादाब" ०४/०२/१७