Saturday, November 21, 2015

चिंगारी है तो फिर आग क्यूँ नहीं बनती

चिंगारी है तो फिर आग क्यूँ नहीं बनती
कुछ चल पड़े फिर भीड़ क्यूँ नहीं चलती !!

आसमान धुयें  का है या धुआँ आसमान
ऊपर की और निगाह क्यूँ नहीं ठहरती !!

कब तलक देखते रहेंगी  यूं तमाशा
जनता खुद ही किरदार क्यूँ नहीं बनती !!

तुम भी हो हम भी हैं वक़्त भी सही है
फिर बातों बातों में बात क्यूँ नहीं बनती !!

इंतज़ार में उम्र है रास्ते पे निगाह
ये बात मंज़िल तक क्यूँ नहीं पहुचती !!

दिन और आएंगे शाम जलती रहेगी
इसी खबर से रात क्यूँ नहीं गुज़रती !!

1 comment:

kuldeep thakur said...

जय मां हाटेशवरी....
आप ने लिखा...
कुठ लोगों ने ही पढ़ा...
हमारा प्रयास है कि इसे सभी पढ़े...
इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना....
दिनांक 22/11/2015 को रचना के महत्वपूर्ण अंश के साथ....
पांच लिंकों का आनंद
पर लिंक की जा रही है...
इस हलचल में आप भी सादर आमंत्रित हैं...
टिप्पणियों के माध्यम से आप के सुझावों का स्वागत है....
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
कुलदीप ठाकुर...