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'Skull of a Skeleton' by Vincent van Gogh |
वो सियासत में सर से पाँव खिल गया
जो भी आया राह में बेगैरत ठहरा
इस ज़माने की रवायतों से हिल गया
कुदरत की साज़िश थी या आदमजात की
आग उगलने वाला हर एक लब सिल गया
रात कोने में बैठा फिर कोई रोता था
उजालों की रफ़्तार में जैसे फिसल गया
एक अरसे से दरिया प्यास छुपाये बैठा था
जो गया किनारे दरिया में हीं मिल गया
तुम कैसे बचे रहे इस ग़लतफ़हमी से
जब कि हर ईमान वाला उसमें जल गया
हर आँख ने खून उगला था उस मंज़र पे
हैरानी है ज़मान इतनी जल्दी भूल गया
हद ये हुई वारदात का चश्मदीद गवाह चाँद
फैसले के दिन बादल पहन निकल गया
किसके जुर्म की सज़ा किसे मिली 'शादाब'
तू भी तो ऐन मौके पर ही बदल गया !
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