Wednesday, November 26, 2014

जाने किस ग़लती की सज़ा देती है

जाने किस ग़लती की सज़ा देती है
देर रात सोऊँ तो भी जगा देती है

एक अरसा हुआ उसके ख़ाबों में रहे
नींद जो आये रुख से पर्दा गिरा देती है

रुस्वाई न दुहाई न गिला न शिकवा
जो बात हुई नहीं सबको बता देती है

नज़र तलाशता हूँ जिसमें वो न दीखे
मौजूदगी का इल्म जा-ब-जा देती है

इस फ़साने को आगे बढ़ाऊँ या रोकूँ
पूछता हूँ जब भी तो मुस्कुरा देती है

इन जुल्मों की फरियाद करूँ किससे
हर एक हाकिम पर जादू चला देती है

उससे ही रौनक है दर्द की दुनिया 'शादाब' 
हर सितम को बेबसी का पता देती है !

जा-ब-जा - everywhere

4 comments:

laljit mahto said...

Mai kin alfaaz me tarif karu aap ki,

har ek labz bone nazar aate muje...........!11

Pankaj Kumar 'Shadab' said...

thank u bhai.

संजय भास्‍कर said...

बहुत सुन्‍दर भावों को शब्‍दों में समेट कर रोचक शैली में प्रस्‍तुत करने का आपका ये अंदाज बहुत अच्‍छा लगा,

Pankaj Kumar 'Shadab' said...

शुक्रिया संजयजी ! सब आपलोगों की इनायत है :)