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'Painter on the Road to Tarascon' by Vincent van Gogh |
चांदनी आईने में छुप कर डरी क्यूँ है
सूरज व्रत तोड़ बहुत दूर निकला
फिर इन सितारों के लबों पे हँसी क्यूँ है
औरों की बर्बादी पे हँसने वालों
तुम्हारी महफ़िल में ख़ामोशी क्यूँ है
जिस्म के चराग जले, लहू तेल बने
महलों के सेहन में अंधियाली क्यूँ है
लूट लो साँसों की जो पूंजी बाकी है
टूटे पिंजड़े में तड़पती ज़िन्दगी क्यूँ है
ऐ पत्थर पहनने वालों पत्थरों
तुम्हारे घर में बिलकती रोटी क्यूँ है
रोटी फेकों भूखे नंगो की फ़ौज पर
फिर देखो सब्र क्या है बेबसी क्यूँ है
मिट जायेगा हर निशाँ नए हवाओं तले
'शादाब' शख़्सियत की नक्काशी क्यूँ है!!
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