Wednesday, December 5, 2018

तुम्हारे शहर में ये धुआँ कहीं और से लाया गया है

तुम्हारे शहर में ये धुआँ कहीं और से लाया गया है
वक़्त रहते संभल जाओ अभी आग नहीं लगाया गया है!


बारूद का ढेर एक अरसे से दिमाग़ में जमाया गया है
तभी तो अफ़वा की चिंगारी को बुलवाया गया है!

जागे होते तो संभल गए होते, मसला तो ये है
साज़िश के तहत तुम्हें सोते हुए चलवाया गया है!

बादलों में हूर का हुस्न और कहीं रक्त से धूली धरती
तभी तो हवा में लटकता मकान बनवाया गया है!

कभी पैरों से ज़मीन को चूमते और होती बेपर्दा आँखें
तो देखते जहाँ को कितना सुंदर सजाया गया है!

कभी ख़ाली बैठो तोशादाबख़ुद से सवाल करो
तुमसे क्या क्या कह के क्या क्या करवाया गया है!!





3 comments:

sweta sinha said...

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ७ दिसंबर २०१८ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

dr.zafar said...

वाह बहुत ही सुंदर जनाब।
मज़ा आ गया।

Kusum Kothari said...

चेतावनी!!मुसीबत को आगाह करती रचना।
सार्थक।