
फिर इंसानियत के नारे बुलंद हों
दोनों हमसफ़र हो ही नहीं सकते
सराब फरोश सारे नज़रबंद हों
अपने फायदे से मज़बूर हो चुके
वाइज़ों की कैसे भी हो ज़ुबाँ कुंद हो
क़ैद-ए-आराम से बाहर भी हस्ती है
अब तो जागें जिन्हे अमन पसंद हो
लज़्ज़ते खूं से जिसके रहबर मदहोश हो
उस दीन के खिलाफ आवाज़ बुलंद हो
क़त्ल हो कर कहीं रूह न तड़प उठे
फरियाद करो ग़म बदन में पाबंद हो
तुम ही गुनहगार, खुद के क़ातिल भी तुम
कबूल लो 'शादाब' कहीं शोहरत न मंद हो !!
सराब फरोश - mirage seller, वाइज़ों- preachers, कुंद - obtuse, रहबर - guide
No comments:
Post a Comment